ज़िंदगी एक खोज है, और इस खोज में जो सबसे बड़ा रोड़ा है, वह है दावा—यह दावा कि मैंने जान लिया, समझ लिया, पा लिया। लेकिन सच तो यह है कि जो जानने का दावा करता है, वह अभी द्वार पर भी नहीं पहुंचा। सच्चा ज्ञान दावा नहीं करता, वह तो आग है—जलाने के लिए, मिटाने के लिए, और फिर राख से कुछ नया उगाने के लिए। जो कहे कि वह बुद्ध को जानता है, वह शायद बुद्ध की मुस्कान का मतलब भी नहीं समझा। बुद्ध ने कभी नहीं कहा कि मैंने सत्य को पकड़ लिया; उन्होंने तो बस इतना कहा कि दुख है, और उससे मुक्ति का रास्ता है। एक बार एक साधु ने गंगा के किनारे बैठे अपने शिष्यों से कहा, “मैंने बुद्ध का सारा दर्शन समझ लिया।” तभी एक नाविक वहां से गुज़रा और उसने पूछा, “महात्मा, आपने बुद्ध को जाना, लेकिन क्या आपने उस मछुआरे को जाना, जो हर सुबह अपने बच्चों के लिए मछली पकड़ता है? क्या आपने उसकी थकान को जाना, उसकी उम्मीद को जाना? साधु चुप हो गए। सच्चा ज्ञान किताबों में नहीं, ज़िंदगी की सांसों में बसता है। जो बुद्ध को जानने का दावा करता है, वह शायद अभी खुद को भी नहीं जान पाया। मार्क्स का सिद्धांत ...
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