समीक्षात्मक लेख चित्रलेखा -भगवती चरण वर्मा

हालांकि उपरोक्त पुस्तक "जिसके हर एक शब्द में अंकित प्रेम और सांसारिक दर्शन की खुशबू पाठक को एक अलगअ असमंजसमें डाल देती है कि क्या वैराग्य भी स्त्री सौंदर्य के अनुराग में पतित हो जाता है? या। अनुराग की पवित्र एकात्मकता में प्रेमी से प्रेयसी का विलय विलासी को भी वैरागी बना देता है? " को समीक्षा की परिधि में बांधना इसके दर्शन के रस को निचोड़कर फेंक देना होगा! फिर भीइ इसअपराध को करने का मात्र एक तर्क है कि मैं लोगों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकूं! 

           पापी कौन है? एक सार्वभौमक अपराधी? या परिस्थितियों का दास? या स्वयं के विपरीत मार्ग पर चल रहे व्यक्ति पर अपनी श्रेष्ठता थोपने के लिए लगाया गया लांक्षन का चरित्र चित्रण? पता नहीं? शायद ये खोज है इस पुस्तक कि! परंतु यह विषय दर्शन और चिंतन का है इसलिए सबका साथ आकर एक उत्तर से सहमत होना अपवाद मात्र होगा? बीज गुप्त पेशे से सामंत और विचार से सौंदर्य और प्रेम का पुजारी है। और इसके विपरीत कुमार गिरि शून्यता की खोज में सांसारिकता का त्याग कर चुका एक वैरागी। जहां बीज गुप्त नर्तकी विधवा "चित्रलेखा" जिसका पेशा समाज में घृणित है ,से प्रेम करता है और उसके साथ भोग - विलास में तल्लीन रहता है हालांकि उसे प्रेम और वासना का अदना सा अंतर पता है इसलिए वह नर्तकी को पत्नी जैसी मानता है। वहीं कुमार गिरी स्त्री को वासना का द्योतक मानते हुए नरक का द्वार बताने की चेष्टा करता है। क्या प्रेम आत्मा का मिलन है? यदि हां तो प्रेम भी शाश्वत होना चाहिए? फिर क्यों परिवर्तन शील संसार की लय में लयबद्ध होकर बदल जाता है प्रेम का स्वरूप? उसका लक्ष्य? ऐसे ही अकाट्य और अविस्मरणीय तर्कों को समेटे हुए शुरू होती है पाप को परिभाषित करने की असंभव कोशिश?

कुमार गिरि का चित्रलेखा से अघोषित शास्त्रार्थ और अनुराग - विराग की अपनी अपनी परिभाषाओं में एक सारगर्भित सत्य और मर्म का अंकित होंना दोनों के परस्पर आकर्षण का कारण सिद्ध होता है। कुमार गिरि ने हर बार चित्रलेखा के चंद्रमा के समान उज्ज्वल सौंदर्य के सामने अपने आप को पराजित पाया आखिर क्यों? फिर भी चित्रलेखा का अपनी विजय पर अपनी हार का दिखना और एक वैरागी का अनुराग के सामने ऐसी विजय युक्त पराजय का अभिप्राय क्या था? क्या काम ही मनुष्यता का केंद्र बिंदु है? या ये प्रेम का कम्पन था जिसे योगी ने प्रथम बार अनुभव किया था? जो भी हो योगी का उद्देश्य है अपनी कमियों पर विजय पाना ! 

आखिरकार "यशोधरा" के साथ बीजगुप्त के विवाह के प्रस्ताव और सामंत के भावी उत्तराधिकारी की चिंता करते हुए चित्रलेखा का उसे त्याग करना और प्रेम की वेदना में कुमार गिरि के सामने खुद के शरीर के आत्मसमर्पण ने उसको पतित कर दिया था। योगी में भी अनुराग की धारा प्रस्फुटित हो चली थी। बीज गुप्त का सेवक श्वेतांक जो एक ब्रह्मचारी था और पाप को परिभाषित करने का अनुभव बटोर रहा था न जाने क्यों इस मोह और उल्लास का दीवाना हो गया? यशोधरा के साथ उसके प्रेम और विवाह की इच्छा फिर बीज गुप्त को मन से कुंठित कर देती है ! चित्रलेखा के अतिरिक्त किसी और को न चाहने का अटल निर्णय अंततः उसे वैरागी बना देता है और वही विशाल देव जो कुमार गिरी के जीवन से शिक्षा ले रहा था ने अपने गुरु योगी के योग का प्रभाव देखा और उनकी कमजोरियां भी?तो निष्कर्ष क्या था? पाप का क्या अर्थ है और इसे कुछ चंद शब्दों में गूंथ देना इतना दुष्कर क्यों प्रतीत होता है?

         मनुष्य परिस्थितियों का दास है - इसलिए विवश है! कर्ता नहीं है, सिर्फ साधन है! तो फिर पुण्य और पाप कैसा?



    

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