यथार्थ 🌱

जिंदगी में कंसेप्ट क्लियर रखिए। यहां कोई किसी के लिए अनन्य रूप से नही है। इंसान अकेला आता है और अकेला निकल लेता है । संग साथ बनते हैं। संग साथ का एक मात्र आधार सुख है । यदि कोई आपके साथ सुखी महसूस करता है तो वह आपका साथ चाहेगा । सुख नही तो वह किनारे हो जाएगा । सुख सेक्स का हो सकता है, सुख भोजन का हो सकता है, सुख सेवा का हो सकता है, सुख सिर्फ बात करने का हो सकता है, सुख महज साथ बैठे होने का हो सकता है। सुख होगा तभी कोई साथ होगा । अन्यथा हो कर भी सम्भव है कि साथ नही हो । कल किसी को आपके साथ सुख मिलता था । कल आपके साथ था । आज नही मिल रहा है तो नही होगा । आप कह सकते हैं कि यह बात सत्य नही है। क्योंकि फेमिली में लोग दुख में भी साथ होते हैं। वो दुख में भी साथ होते हैं क्योंकि वहां दायित्व निभाने का सुख है। ईगो की तुष्टि है। कि दुख में भी मैं साथ हूँ; यह कहने का भी सुख है । फंडामेंटली यहां कोई किसी के लिए नही है। हर कोई अकेले आता है और अकेले चला जाता है। साथ कोई है तो इसलिए कि साथ सुख दे रहा है। आनन्द दे रहा है। सुख खत्म साथ खत्म !

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