धैर्य



बचपन में पहली दौड़ प्रतियोगिता याद है। एक-दो-तीन की गिनती और फिर सब अपनी अपनी पंक्ति में तेजी से दौड़ते। पचास-सौ मीटर की इस छोटी सी दौड़ में भी होड़ थी कि पहला नंबर कौन आता है।

फिर प्रतियोगिता रही परीक्षाओं में अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने की फिर अच्छे कॉलेज में प्रवेश, और फिर सबसे अधिक वेतन वाली नौकरी की। 

ये प्रक्रिया चलती रही। 

हम आगे बढ़ते रहे। जब जीते तो हमें प्रसन्नता हुई। जब हार गए तो हमें दुःख हुआ। इस पूरी यात्रा   में कुछ कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने न तो प्रतिस्पर्धा में भाग लिया, न दुःखी हुए। हमने उन्हें सफल नहीं माना। कमजोर भी समझ लिया। क्या हमने धैर्य रखा? हां, हमने धैर्य तो रखा लेकिन जो लोग प्रतिस्पर्धी नहीं थे, उन्हें भी हेय दृष्टि से देखा। यह भी मान लिया कि वे अपना अमूल्य समय बर्बाद कर रहे हैं। किन्तु सत्य तो कुछ और ही था।

 वे अपनी गति से, धैर्य से आगे बढ़ते रहे। स्वयं के लिए सफलता के स्तर चुनते गए और सुखी रहे। किन्तु हम यह नहीं समझ सके क्योंकि यह मानव स्वभाव है और यह हमारी आदत बन गयी है। धैर्य को कम आंका गया है। लेकिन न सिर्फ प्रतिस्पर्धा में, बल्कि हमारे दैनिक और आध्यात्मिक जीवन में भी धैर्यवान होना महत्वपूर्ण है। क्यों? क्योकि धैर्य धारण करना दैविक शक्ति प्राप्त करने के समान है।


धैर्य की अवधारणा अक्सर विचित्र, बीते युग का अवशेष प्रतीत होती है। फिर भी, इसकी शांत सतह के नीचे एक अद्वितीय ताकत छिपी हुई है- एक ऐसी क्षमता जो पर्वतों को हिला सके, समुद्र पार करा सके और नियति बदल दे। 

यह स्थिर संकल्प बनाती है और हमें समझाती है, कि यह मात्र सदूण से परे हैं- और हमारे अस्तित्व के सार में निहित है। तो क्या अत्यधिक धैर्य या अत्यधिक परिश्रम से हम कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं? नहीं। 

इसकी विशेषता है कि यह शक्ति अत्यंत धीरे प्राप्त होती है। हम चाहे कितना भी प्रयत्न कर ले, यदि कोई कार्य किसी क्षण संभव नहीं है तो वही निश्चित ही नहीं हो सकेगा। यहां कबीर का दोहा स्मरण होता है।


धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । 

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ॥


 अर्थात, हे मन, धीरे-धीरे सब कुछ हो जाएगा। माली सैकड़ों पेड़ों में घड़े भर कर पानी देता है, परंतु फल तभी उगते हैं जब उस पेड़ की ऋतु आती है। अर्थात धैर्य रखने से और सही समय आने पर ही काम पूरे होते हैं।


लेकिन वास्तव में धैर्यवान होने का क्या मतलब है? और निष्क्रिय प्रतीत होने वाला गुण शक्ति और गति का पर्याय कैसे हो सकता है? इस विरोधाभास को सुलझाने के लिए, हमें उन प्राचीन ग्रंथों से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने सहस्राब्दियों तक मानवता का मार्गदर्शन किया है।


धैर्यं सर्वत्र सर्वदा, सर्वदा धैर्यमेव हि। 

धैर्येण हि सुखं सर्वं, नास्ति दुःखं कदाचन।।


अर्थात, धैर्य हर जगह और हर समय में होता है। धैर्य ही से सब सुख होता है, कभी दुःख नहीं होता।


इसी प्रकार, उपनिषदों में भी धैर्य के विषय में कहा गया है कि यह मानव अस्तित्व में परिवर्तनकारी शक्ति के रूप कार्य करता है। धैर्य से संपन्न लोग दुःख पर काबू पा सकते हैं और सफलता के शिखर को प्राप्त कर सकते हैं। धैर्य, जिसे सभी उपलब्धियों की आधारशिला के रूप में दर्शाया गया है, को लचीलेपन और अनुग्रह के साथ जीवन की कठिनाइयों से निपटने की कुंजी के रूप में भी चित्रित किया गया है। इसके माध्यम से, व्यक्ति न केवल विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हैं बल्कि मजबूत और समझदार भी बनते हैं।


किन्तु यह एक सक्रिय अभ्यास से ही प्राप्त हो सकता है, जो बाधाओं के बावजूद व्यक्तियों को अपने प्रयासों के प्रति समर्पित रहने में सहायक होता है। इसकी विशेषता है कि धैर्य केवल अस्थायी लाभ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक संवर्धन और पूर्ति भी शामिल है। चाणक्य ने भी उल्लेख किया है कि किसी भी लड़ाई को जीतने के लिए संयम और समझदारी बहुत आवश्यक है। समझदारी के साथ ही संयम बनाए रखने के गुरु आते हैं- और ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। संकट की घड़ी में आपकी सलाह, ज्ञान, अनुभव और हौंसले से ही ताकत मिलती है। विपरीत परिस्थितियों में इनके पालन से ही आपको सफलता प्राप्त होगी। यह बात आध्यात्मिक यात्रा पर भी लागू होती है।


लेकिन आध्यात्मिक विकास की यात्रा में धैर्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसका उत्तर हमें ब्रह्मांड के कालातीत ज्ञान में मिलता है। हमारा अस्तित्व ही धैर्य का पर्याय है और यह पृथ्वी के सृजन की प्राकृतिक लय के साथ संरेखित है। सोचिए, अगर सृष्टि की रचना उस क्षण में नहीं होती जब जीव अस्तित्व में आए, या यूं कहें कि जिस क्षण 'बिग बैंग' हुआ - उस समय नहीं होता- तो क्या हम अस्तित्व में होते ? हमारा सम्पूर्ण सार ही सामंजस्य पर आधारित है। हम सभी 'ॐ सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु, सहवीर्यं करवावहै' की भावना में ही सम्मिलित हैं- और यह शांति मन्त्रसद्भाव और एकता के आशीर्वाद का आह्वान करते हुए, हम सभी प्राणियों के अंतर्संबंध और करुणा, और सहानुभूति को बढ़ावा देने में धैर्य के महत्व की याद दिलाता है।


प्रश्न यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में धैर्य कैसे विकसित कर सकते हैं और इसका उपयोग कैसे कर सकते हैं? इसका उत्तर मानसिक शांति और आत्म- जागरूकता के अभ्यास में निहित है। वर्तमान क्षण को अपनाकर और अतीत और भविष्य के प्रति अपना लगाव त्यागकर, हम अपने भीतर मौजूद अनंत संभावनाओं का दर्शन स्वतः ही कर सकते हैं। यह भी सत्य है कि अभ्यास के लिए समय चाहिए और वर्तमान परिपेक्ष्य में सब कुछ तेजी से बदल रहा है। उसी प्रकार, आध्यात्मिक विकास की यात्रा भी गतिशील है। यह हमारी बचपन की पचास मीटर की दौड़ नहीं, एक मैराथन है- जिसके लिए धैर्य, दृढ़ता और अटूट संकल्प की आवश्यकता है। जैसे-जैसे हम इस मैराथन के घुमावदार रास्ते के उतार-चढ़ाव से गुजरते हैं, आवश्यक है कि हम गति पकड़ते हुए धीरज भी अपनाएं।

 उसी धैर्य की गति के प्रवाह से हम बिना किसी से प्रतिस्पर्धा किए उस मार्ग पर आगे बढ़ सकेंगे जो आत्मज्ञान के शिखर पर ले जाएगा।


योग एवं अध्यात्म की ओर एक यात्रा।

🧘‍♂️

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