त्याग

क्या आपने कभी बीज को मिट्टी में गुम होते देखा है? संभवतः नहीं... क्योंकि हम कभी इतना ध्यान ही नहीं देते। हम ध्यान देते हैं जब पहला पत्ता उगता है, या पहला फूल खिलता है या पहला फल आता है। क्या इसका अर्थ है कि बीज तुच्छ था? नहीं। एक छोटा सा बीज, जो बिना कुछ कहे मिट्टी में समा जाता है, और फिर महीनों बाद किसी वृक्ष का रूप लेता है। तो क्या मिटने में ही जन्म छिपा है? क्या फल का गिरना ही आगे बढ़ने की पहली शर्त है? क्या यह केवल प्रकृति का नियम है या जीवन का गूढ़ सत्य भी है? कभी घास को आंधी में झुकते हुए देखा है? क्या उसमें भी कोई मौन शिक्षा छिपी है?
एक बीज जब धरती की गोद में समा जाता है, तो वह कुछ नहीं चाहता। न कीर्ति, न पुष्प, न फल। केवल मिट्टी में समा जाता जाता है। और यही उसका सबसे बड़ा आत्म-त्याग है। बीज का धर्म है कि वह स्वयं मिटे, ताकि वृक्ष जन्म ले। यदि बीज बचा रहेगा, तो वृक्ष कभी नहीं आएगा। यह दृश्य तो बाल मन को भी सरल लग सकता है, परंतु इसी में में जीवन का सत्य छिपा है कि जो जाना नहीं चाहता, वह नया जन्म कैसे लेगा? संसार में जितनी भी सुन्दरता है, वह किसी त्याग का परिणाम है। 
यहां तक की हर जीत भी किसी की हार है और हर खुशी भी दुःख के बाद ही आई है। बीज की मृत्यु ही वृक्ष का प्रारंभ है। इसी भाव को उपनिषदों ने कहा है कि जब तक एक रूप मिटता नहीं, तब तक दूसरे का आरंभ नहीं होता। जिस प्रकार आरम्भ में यह सम्पूर्ण विश्व 'असत्' (अस्तित्वहीन) एवं 'अव्यक्त' था, इसने स्वयं ही अपना सृजन ही किया, अन्य किसी ने उसको नहीं सृजा। यह वस्तुतः अन्य कुछ नहीं, इस अस्तित्व के पीछे छिपा हुआ आनन्द, रह ही है। जब प्राणी इस आनन्द को, इस रस को प्राप्त कर लेता है तो वह स्वयं आनन्दमय बन जाता है।

इस प्रकार, घास जब आंधियों में झुकती है, तो वह पराजित नहीं होती, वह समर्पित होती है और आनंदित होती है। उसका झुकना एक योग है, क्योंकि वही उसे बचाता है। पर्वत अड़ जाते हैं और टूट जाते हैं, पर घास झुक जाती है और बच जाती है। झुकना, आत्मा का सबसे सूक्ष्म गुण है। झुकने में जो माधुर्य है, वह अडिगता में नहीं। नम्रता, सत्य का मुख है। परंतु हम उसे दुर्बलता समझ बैठे हैं। जब आत्मा में झुकने की क्षमता आती है, तब वह अपने छोटेपन में विराट को आमंत्रित करती है। यह झुकाव केवल नैतिक या
व्यवहारिक नहीं, यह ब्रह्म से संवाद की स्थिति है। विनय से ही योगी की सत्ता परिपक्व होती है। शाख से जब फल टूटता है, तो वह मृत्यु नहीं, परिपक्वता होती है। 

फल का झड़ना एक पूर्णता का संकेत है क्योंकि अब वह अन्न बनेगा, बीज बनेगा, फिर किसी अन्य वृक्ष का आधार बनेगा। फल का गिरना आत्मस्फुरणा है, यह जीवन का संन्यास है। जब हमारी चेतना पकती है, तो हम भी सहज ही मोह से, पहचान से, पद से गिरते हैं, लेकिन उस गिरावट में ऊपर उठना छिपा होता है। जैसे गुरु अपनी भूमिका छोड़कर शिष्य को ब्रह्म में स्थापित करता है, वैसे ही फल जब गिरता है, तो वह भूमि के गर्भ में भविष्य बो देता है। तो यदि बीज न मिटे, तो अंकुर नहीं जन्मेगा। यदि घास न झुके, तो वह टूट जाएगी। यदि फल न गिरे, तो नया वृक्ष नहीं उगेगा। यही शाश्वत चक्र है जन्म, वृद्धि, परिपक्वता और विसर्जन का। हमारे भीतर भी यह चक्र चलता है, पर हम उसमें अटक जाते हैं।
 हम पक जाते हैं, पर गिरना नहीं चाहते। हम बदलना चाहते हैं, पर छोड़ना नहीं चाहते। और यही मोह है जो हमें वर्तमान में अटकाए रखता है, और भविष्य को आने नहीं देता। ब्रह्म को पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। त्याग के बाद ही शांति आती है। यह केवल वस्त्र, अन्न या धन का त्याग नहीं है, यह उस अहं का त्याग है जो स्वयं को फल, बीज और शाख, तीनों मानता है। जब हम जीवन में कोई भूमिका निभाते हैं, तो उस भूमिका में इतना लिप्त हो जाते हैं कि वह हमारी पहचान बन जाती है। पर जब समय आता है कि वह भूमिका समाप्त हो, तो हम छूटने से डरते हैं। वहीं, आत्मा का विकास रुक जाता है। यह भय ही रजोगुण है, जो वस्तुओं में आसक्ति उत्पन्न करता है।

जैसे अग्नि से असंख्य चिंगारियां निकलती हैं और लौटती हैं, वैसे ही यह आत्माएं जन्म लेती हैं और पुनः ब्रह्म में विलीन हो जाती हैं। यह आना-जाना तभी संभव है जब आत्मा इस चक्र को अपनाए। इस प्रकार, जीवन कोई रेखीय घटना नहीं, वह वृत्त है जिसका केंद्र ब्रह्म है। ऋषियों ने वृक्षों, पुष्पों, नदियों में सत्य देखा। और वही वेदों का सौंदर्य है। उसमें ब्रह्म सागर में नहीं, तिनकों में प्रकट होता है। 

श्वेताश्वतर उपनिषद् कहता है कि
 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
वह एक देव सभी में छिपा है - तृण में, तरु में, तुम में, हम में।
इसलिए जब अगली बार हम कोई बीज भूमि में डालें, कोई घास आंधी में झुकती देखें, या कोई फल सहजता से टपकते देखें तो यह केवल दृश्य नहीं है। यह एक मंत्र है। एक ध्यान है। वह बीज हमें कह रहा है कि हम भी मिटें, तो जीवन प्रस्फुटित होगा। वह घास कह रही है कि हम भी झुकें, तो अस्तित्व बचेगा। वह फल कह रहा है कि हम भी गिरें, तो नए वृक्ष उपजेंगे। यह सारे दृश्य केवल प्रतीक नहीं हैं, यह आह्वान हैं भीतर के ब्रह्म को प्रकट करने का।

सत्य यह है कि जब तक हम जीवन को अधिकार की दृष्टि से देखेंगे, तब तक त्याग असह्य लगेगा। पर जब जीवन को सत्य की भांति देखें, तब त्याग फल देगा। त्याग वह दीप है जिसमें आत्मा का घृत जलता है, और फिर प्रकाश फैलता है। यही आह्वान है जिसके हर विसर्जन में ब्रह्म की गूंज है।

याद रखियेगा ।

जीवन उसी का स्वर है, जो स्वयं को नितांत मौन में विसर्जित करता है।

जून ०१ सन् २०२५ 
पठानकोट 

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