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योग

मानव शरीर में हमारे जन्म के साथ, प्राकृतिक विकास समाप्त हो जाता है, और आध्यात्मिक विकास शुरू हो जाता है। हम एक दहलीज तक पहुँचते हैं, जानवरों से जैविक विकास का अंत और मानव में आध्यात्मिक विकास की शुरुआत। इस विकास को अंजाम देने के लिए, प्रकृति हमें एक विशेष उपकरण प्रदान करती है, जिसे जागरूकता कहा जाता है। समय और स्थान के संबंध में स्वयं के बारे में जागरूकता। जब हम सोचते हैं, तो हम जानते हैं कि हम सोच रहे हैं, और हम जानते हैं कि हम जानते हैं कि हम सोच रहे हैं। यह क्षमता जानवरों में नहीं होती है। यह विकास एक अलग मोड़ लेता है, यह इंद्रियों, मन, बुद्धि, भावनाओं और स्वयं के स्तर पर जारी रहता है। हमारे विकास को नियंत्रित करने वाली प्रकृति के बजाय, हम अपने स्वयं के विकास का प्रभार ले सकते हैं। योग जागरूकता के एक विशेष उपकरण की मदद से इन मानसिक क्षमताओं को विकसित करके आध्यात्मिक विकास को बहुत तेज करने में मदद करता है।    योग से हम जो समझते हैं.! अपने सीमित ज्ञान के साथ, हम योग को स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए आसन, प्राणायाम और कुछ ध्यान अभ्यासों के रूप में देखते हैं। यो...

राम

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         राम जीवन में मर्यादा का पालन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। जीवन की आपाधापी में हम वैसे तो सारी सुविधाओं को हासिल करने के लिए कुछ भी करने के लिए उतारु रहते हैं लेकिन मर्यादा को बनाए रखने या उसे हासिल करने की बात भी करने से हिचक रहे हैं। भले ही समय के साथ रामनवमी की शोभायात्रा हाइटेक हो गई हो लेकिन यह भी सच है कि हम नई पीढ़ी को राम की कहानियों से दूर करते जा रहे हैं। हम सब नई पीढ़ी को उस मर्यादा पुरुषोत्तम की बात सुनाना या पढ़ाना नहीं चाहते हैं जो विषम परिस्थितियों में भी नीति सम्मत रहे। जिन्होंने वेदों और मर्यादा का पालन करते हुए सुखी राज्य की स्थापना की। स्वयं की भावना व सुखों से समझौता कर न्याय और सत्य का साथ दिया। राम की सेना में पशु, मानव व दानव सभी थे और उन्होंने सभी को आगे बढ़ने का मौका दिया। केवट हो या सुग्रीव, निषादराज या विभीषण।  वे न केवल कुशल प्रबंधक थे, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। वे सभी को विकास का अवसर देते थे। आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मोत्सव तो धूमधाम से मनाया जाता है पर उनके आदर्शों को जीवन में नहीं...

how's you? I am fine....🤝

क्या आप सोच सकते है how's you? की औपचारिकता भरे सवाल के औपचारिकता भरे जबाब I am fine के समय में किसी का यह कहना की "मैं ठीक महसूस नही कर रहा/रही".. कितना कठिन रहा होगा...  बस पूछ लेना भर ही तो है.. कहो न क्या हुआ? मैं हूँ न, भरोसा रखो ...  क्या भागती दौड़ती दुनिया में इतना भर रुकना नही हो सकेगा,जिसने आपका दरवाज़ा ख़ुद खटखटाया है..आपसे मदद के लिए... आओ रो लो मेरे कंधे पर सिर रखकर, मैं अजनबी ही सही... हम किसी का दुःख ठीक ठीक नही समझ सकते,हो सकता है हम उसके दुःख का निवारण न करें, हम इतने काबिल नहीं की कोई सटीक सुझाव दे सके,  पर इतना भर तो कह ही सकते है कि कहो मैं सुन रहा हूँ, तुम्हारा दुःख बांटने की कोशिश करूँगा/ करूँगी... सुनने की काबलियत के साथ तो हर किसी ने जन्म लिया है..शायद तुम बेहतर महसूस करो... किसी का दुःख सुनने और बांटने के लिए कोई जरूरी नही की आप उसके पास बैठे हो...और पास न होने की असमर्थता का बहाना हो..  यकीन मानिए आपका इतना भर कहना कि मैं सुन रहा/रही हूँ तुम्हें..किसी को उसके अंधेरे से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त है...यह एक रोशनी की तरह है.. एक बढ़ते हाथ की...

Life is an experience

Life is one word that comes with multiple meanings and experiences. Above all, life is not just about existence but also about how an individual defines that existence. Almost every day of everyone’s life is an experience. Every new experience influences a person’s way of looking at life. Thus, there cannot be one single way in which one can look at life, consequently there cannot be one single meaning and purpose one might find to one’s life. Life is not the same for everyone. Life is the journey of Living. We live, we lead our life and we die. In doing so, we try to give shape to our lives. In past years I have been thinking how do experiences shape someone’s life? I believe experiences are episodes that changed the outlook of an individual, and these in turn shape a person’s life.

समीक्षात्मक लेख चित्रलेखा -भगवती चरण वर्मा

हालांकि उपरोक्त पुस्तक "जिसके हर एक शब्द में अंकित प्रेम और सांसारिक दर्शन की खुशबू पाठक को एक अलगअ असमंजसमें डाल देती है कि क्या वैराग्य भी स्त्री सौंदर्य के अनुराग में पतित हो जाता है? या। अनुराग की पवित्र एकात्मकता में प्रेमी से प्रेयसी का विलय विलासी को भी वैरागी बना देता है? " को समीक्षा की परिधि में बांधना इसके दर्शन के रस को निचोड़कर फेंक देना होगा! फिर भीइ इसअपराध को करने का मात्र एक तर्क है कि मैं लोगों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकूं!             पापी कौन है? एक सार्वभौमक अपराधी? या परिस्थितियों का दास? या स्वयं के विपरीत मार्ग पर चल रहे व्यक्ति पर अपनी श्रेष्ठता थोपने के लिए लगाया गया लांक्षन का चरित्र चित्रण? पता नहीं? शायद ये खोज है इस पुस्तक कि! परंतु यह विषय दर्शन और चिंतन का है इसलिए सबका साथ आकर एक उत्तर से सहमत होना अपवाद मात्र होगा? बीज गुप्त पेशे से सामंत और विचार से सौंदर्य और प्रेम का पुजारी है। और इसके विपरीत कुमार गिरि शून्यता की खोज में सांसारिकता का त्याग कर चुका एक वैरागी। जहां बीज गुप्त नर्तकी विधवा "चित्रलेखा" जिसका पे...

दोस्ती

साँस लेना छोड़  सकते हो तय करके? तो दोस्तियाँ कैसे  तोड़ लेते हो तय करके? जो तय करके टूटी है दोस्ती,  वो फिर तय करके हुई भी होगी! और तय करके जो होता हो,  वो तो स्वार्थवश ही होता है!

युवा

इधर-उधर से  उम्मीद छोड़ो,  नाता तोड़ो।  जिधर गति है,  जहाँ सार्थकता है,  उधर को जाओ;  सब मस्त होगा ।