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आदमी जब बेचैन होता है तो ऊपर से बिल्कुल शांत दिखता है। वह सबकुछ सामान्य दिखाने की सफल कोशिश करता है। सबसे गर्मजोशी से मिलना, हँसकर बातें करना, आपकी जरुरी बातों को ध्यान दिलाना जैसे सारे काम करता है।  लेकिन ध्यान से देखें तो आपको उसकी हँसी में एक फीकापन, एक बनावटीपन और एक औपचारिकता ज़रूर दिखेगी जिन्हें वो छुपाना चाहते हैं।  अगर आप किसी अपने को लंबे अरसे से जान रहे हैं तो आप उस अभिनय को पहचान लेंगे अन्यथा आपका होना उसके लिए व्यर्थ है। हर आदमी चाहता है कि उसकी उदासी पढ़ी जाए उसके किसी प्रिय द्वारा। आप वो प्रिय नहीं बन पा रहे तो उसमें आपकी विफलता है।  आखिरी बार आप में से कितने लोगों ने बिना कारण के किसी अपने दोस्त या प्रिय को मैसेज/ कॉल करके उससे उसका हाल पूछा है? अगर आप हैं तो आपको मोहब्बत भेज रहा हूं और बाकियों को लानतें।  जीवन जीने का एक ही और अंतिम तरीका है स्वयं को खुश रखने के साथ- साथ अपने आसपास के लोगों का ख्याल रखना। आपसे में से कुछ लोग होंगे जो कहेंगे कि " मैं ही क्यों रखूं?" बात ऐसी है कि जहां हम कारण ढूंढने लगते हैं वहाँ केयर नहीं होती, वहाँ प्रेम नहीं होता।...

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स्त्रियों ने सदैव पुरुषों के इशारों पर जीवन जिया है। बचपन से लेकर आजक स्त्रियों का अपना कोई फ़ैसला नहीं होता।  कपड़ा, लता, खाना पीना का फैसला को छोड़ दें तो उसे किस से बात करनी है, किसके पास रहना है, कैसे जीवन जीना है, क्या पहनना है, कितना पहनना है, जॉब करनी है या घर में ही रहना है। सब कुछ फैसले मर्दों का है। आज बेटीयाँ सुरक्षित नहीं हैं इसका श्रेय भी पुरुषों को ही जाता है।  ये समाज की हार है कि हमारी बेटियाँ खौफ़ में हैं। कहीं भी अकेली आने जाने में डर है। कुछ ही दिन बीतते हैं जब लड़कियाँ सोचती है कि अकेली कभी सड़क पर घूमूं परन्तु पुनः कोलकाता जैसी खबर आ जाती है। जो स्त्रियाँ अपने अंदर एक ऊर्जा भरी होती है, एक पहचान बनाने के लिए घर से दूर जाना चाहती है फिर से उन्हें घर मे कैद कर दिया जाता है। कहा जाता है घर में रहो, सुरक्षित रहोगी। बाहर खतरा है, बाहर दरिंदे घूम रहे हैं। पर एक सवाल है, उन दरिदों के भी तो बहनें होती होंगी? उन्हें ये ख्याल क्यू नहीं आता कि स्त्रियाँ भी किसी की बहन है। चलो माना आप स्त्रियों की इज्जत नहीं करतै लेकिन उन मर्दों की करो जिनकी बहनें हैं। ...

तितिक्षा

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कल्पना कीजिए कि आप खाना बना रहे हैं। तेल या घी के गर्म होने पर, आप जैसे विभिन्न सामग्रियां - सब्जियां, मसाले इत्यादि बर्तन में डालते हैं, सुसंगत तापमान बनाए रखने की आवश्यकता होती है। यदि बर्तन अधिक गर्म है, तो आपका पकवान जल सकता है। यदि तापमान कम है, तो शायद पकवान कच्चा ही रह जाए। पूरी प्रक्रिया के दौरान, आपको यह सुनिश्चित करने के लिए तापमान को सावधानीपूर्वक समायोजित करना होगा ताकि सम्पूर्ण सामग्री कुछ समान रूप से पक जाए। यह सचेतन नियमन और परिणाम पर निरंतर निगरानी रख कर व्यंजन तैयार करने वाले लम्बे लगने वाले समय को स्वीकार करना भारतीय दर्शन में 'तितिक्षा' की अवधारणा के समान है। यह किसी खेल के समान है- हमें ध्यान से खेलना है, परिश्रम करना है ताकि हम अच्छे परिणाम प्राप्त करें। संस्कृत शब्द तितिक्षा पर अक्सर वेदांत और योग परंपराओं में चर्चा की गयी है, जिसे सहनशीलता या धीरज के मानसिक दृष्टिकोण के समरूप माना गया है। यह गुण जीवन की विभिन्न चुनौतियों के बीच समभाव और संयम बनाए रखने के बारे में है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आपके पकवान के बर्तन की देखभाल - जिसके लिए आपके धैर्य ...

धैर्य

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बचपन में पहली दौड़ प्रतियोगिता याद है। एक-दो-तीन की गिनती और फिर सब अपनी अपनी पंक्ति में तेजी से दौड़ते। पचास-सौ मीटर की इस छोटी सी दौड़ में भी होड़ थी कि पहला नंबर कौन आता है। फिर प्रतियोगिता रही परीक्षाओं में अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने की फिर अच्छे कॉलेज में प्रवेश, और फिर सबसे अधिक वेतन वाली नौकरी की।  ये प्रक्रिया चलती रही।  हम आगे बढ़ते रहे। जब जीते तो हमें प्रसन्नता हुई। जब हार गए तो हमें दुःख हुआ। इस पूरी यात्रा   में कुछ कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने न तो प्रतिस्पर्धा में भाग लिया, न दुःखी हुए। हमने उन्हें सफल नहीं माना। कमजोर भी समझ लिया। क्या हमने धैर्य रखा? हां, हमने धैर्य तो रखा लेकिन जो लोग प्रतिस्पर्धी नहीं थे, उन्हें भी हेय दृष्टि से देखा। यह भी मान लिया कि वे अपना अमूल्य समय बर्बाद कर रहे हैं। किन्तु सत्य तो कुछ और ही था।  वे अपनी गति से, धैर्य से आगे बढ़ते रहे। स्वयं के लिए सफलता के स्तर चुनते गए और सुखी रहे। किन्तु हम यह नहीं समझ सके क्योंकि यह मानव स्वभाव है और यह हमारी आदत बन गयी है। धैर्य को कम आंका गया है। लेकिन न सिर्फ प्रतिस्पर्धा में...

"यथार्थ को जानिए "

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प्रकृति के नियमों में यह एक महत्वपूर्ण सत्य है कि सभी धर्म, पद, प्रतिष्ठा, और धन अनित्य हैं। इस अनित्यता का खोज उपरांत हम यह समझते हैं कि सच्चा सुख और संतोष अंतर्निहित होता है, न कि बाह्य वस्तुओं में। त्याग और नाश, ये दोनों ही अहम वास्तविकताओं के पहलू हैं। त्याग करना वास्तविक स्वतंत्रता का प्रतीक है, जबकि नाश स्वयं की अनुभूति के बिना वस्तुओं का अस्तित्व का अन्त होता है। इसी तरह, हमें यह समझना चाहिए कि सभी धर्म, पद, प्रतिष्ठा, और वैभव केवल माया हैं, जो विस्थापित होती है और फिर अपने आप ही नष्ट होती हैं। हमें इस बात का आदर्श बनाकर, आत्म-समर्पण और संतोष के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।  इस प्रकार, हमें अपने जीवन को अनित्यता के बीच उदारता और सहानुभूति के साथ जीना चाहिए। यह हमें वास्तविक संतोष और स्थिरता की ओर ले जाएगा, जो हमें आत्मिक शांति और पूर्णता की अनुभूति देगा। प्रकृति में सदा कुछ भी अस्थायी है, यह एक महत्वपूर्ण सत्य है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए। जीवन का मूल्य और महत्व समझने के लिए हमें अनित्यता के इस तत्व को समझना आवश्यक है। इसलिए हमें उदारता और सहानुभूति के साथ जीने...

Ishavasya Upnishad

"Know your Upnishad" --Ishavasya Upnishad-- The Ishavasya Upanishad, also known as the Ishavasya or Isha Upanishad, is one of the shortest and most profound Upanishads. Here are some details about it: 1. **Origin**: The Ishavasya Upanishad is part of the Shukla Yajurveda. It consists of 18 verses (mantras) and is considered one of the oldest Upanishads, dating back to around 1st millennium BCE. 2. **Authorship**: Like many Upanishads, the authorship of the Ishavasya Upanishad is uncertain. It is traditionally attributed to Sage Yajnavalkya. 3. **Theme**: The central theme of the Ishavasya Upanishad revolves around the concept of Ishvara, the supreme divine principle, and its relationship with the individual self (Atman). It explores the idea that everything in the universe is pervaded by Ishvara and should be viewed with reverence and detachment. 4. **Teachings**: The Upanishad begins with the famous invocation "Isha vasyam idam sarvam," which translates t...

इश्क के तीन तह!

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इश्क के तीन मुकाम होते हैं ! पहला मुकाम है जब लड़की और लड़का एक दूसरे के प्रति सेक्सुअली आकर्षित होते हैं ।  यहां आकर्षण का एक मात्र कारण सेक्स होता है ।  शुद्ध सेक्स , यह एक दम शरीर के तल का स्टेप है ।  सबसे अधिक पीड़ा भी इसी तल पर होती है। आकर्षण खिंचती है, दोनों एक दूसरे से सेक्स करना चाहते हैं ।  यौन तृप्ति चाहते हैं । इसमें यदि बाधा उतपन्न हो किसी भी कारण से तो भारी पीड़ा होती है ।  यह जो लोग कहते हैं कि इश्क में बहुत तकलीफ होती है, वह वस्तुतः यही तकलीफ है ।  वह सेक्स की तकलीफ है ,वह यौन अतृप्ति है । दूसरा मुकाम बुद्धि का मुकाम है ,इंटेलेक्ट का मुकाम है ,मेंटल आकर्षण का स्टेज है ।  जब सेक्स की आंच धीमी पड़ती है ,जब सेक्स में कोई बाधा नही रहती है ।  जब दोनों साथ रहते हैं और जब मर्जी तब सेक्स करने के लिए स्वतंत्र रहते हैं, सेक्स करते हैं तृप्त होते हैं ।  तब मेंटल ट्यूनिंग है जो इश्क को अगले स्टेप पर ले जाती है, बुद्धि के लेवल पर ,नही बैठे ट्यूनिंग तब एक खिंचाव उतपन्न होता है ।  दोनों को ही लगता है कि दोनों ही एक दूसरे की ब...