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Ishavasya Upnishad

"Know your Upnishad" --Ishavasya Upnishad-- The Ishavasya Upanishad, also known as the Ishavasya or Isha Upanishad, is one of the shortest and most profound Upanishads. Here are some details about it: 1. **Origin**: The Ishavasya Upanishad is part of the Shukla Yajurveda. It consists of 18 verses (mantras) and is considered one of the oldest Upanishads, dating back to around 1st millennium BCE. 2. **Authorship**: Like many Upanishads, the authorship of the Ishavasya Upanishad is uncertain. It is traditionally attributed to Sage Yajnavalkya. 3. **Theme**: The central theme of the Ishavasya Upanishad revolves around the concept of Ishvara, the supreme divine principle, and its relationship with the individual self (Atman). It explores the idea that everything in the universe is pervaded by Ishvara and should be viewed with reverence and detachment. 4. **Teachings**: The Upanishad begins with the famous invocation "Isha vasyam idam sarvam," which translates t...

इश्क के तीन तह!

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इश्क के तीन मुकाम होते हैं ! पहला मुकाम है जब लड़की और लड़का एक दूसरे के प्रति सेक्सुअली आकर्षित होते हैं ।  यहां आकर्षण का एक मात्र कारण सेक्स होता है ।  शुद्ध सेक्स , यह एक दम शरीर के तल का स्टेप है ।  सबसे अधिक पीड़ा भी इसी तल पर होती है। आकर्षण खिंचती है, दोनों एक दूसरे से सेक्स करना चाहते हैं ।  यौन तृप्ति चाहते हैं । इसमें यदि बाधा उतपन्न हो किसी भी कारण से तो भारी पीड़ा होती है ।  यह जो लोग कहते हैं कि इश्क में बहुत तकलीफ होती है, वह वस्तुतः यही तकलीफ है ।  वह सेक्स की तकलीफ है ,वह यौन अतृप्ति है । दूसरा मुकाम बुद्धि का मुकाम है ,इंटेलेक्ट का मुकाम है ,मेंटल आकर्षण का स्टेज है ।  जब सेक्स की आंच धीमी पड़ती है ,जब सेक्स में कोई बाधा नही रहती है ।  जब दोनों साथ रहते हैं और जब मर्जी तब सेक्स करने के लिए स्वतंत्र रहते हैं, सेक्स करते हैं तृप्त होते हैं ।  तब मेंटल ट्यूनिंग है जो इश्क को अगले स्टेप पर ले जाती है, बुद्धि के लेवल पर ,नही बैठे ट्यूनिंग तब एक खिंचाव उतपन्न होता है ।  दोनों को ही लगता है कि दोनों ही एक दूसरे की ब...

बसंत 🌱 पंचमी।💛

कर्तव्यों की यात्रा होनी चाहिए भविष्य के आदर्श की स्थापना की। ये यात्रा होनी चाहिए, स्वयं को परिष्कृत, परिमार्जित करने की, चरित्र की स्थापना की, व्यक्तित्व के अनवरत विकास की। ये यात्रा होनी चाहिए परिवार के आदर्श की, समाज के दिव्य संस्कार की, लोकमंगल के अपार धैर्य की, समाज में समन्वय के प्रतीक की। ये यात्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे यह स्पष्ट हो कि जीवन के विभिन्न चरणों में आपका कर्म क्या हो। कर्तव्य यात्रा अनवरत चलती रहे। आज बसंत पंचमी के महान पर्व पर आप सभी को बसंत ऋतु के आगमन और विद्या की देवी मां सरस्वती पूजा पर्व की अनंत शुभकामनाएं। ऋतुराज बसंत हम सभी के ज्ञान की परिधि को अनंत तक पहुंचाए। सोचने की क्षमता को सुदृण करें। विवेक के उच्चतम स्तर तक पहुंचाए और हमें संवदेनशील बनाए रखें। बसंत की ऊष्मा से हम सर्वदा सुचारू रहें। बसंत हमारी जड़ता को समाप्त कर हमारे जीवन प्रवाह का अनंत प्रसार करते रहें। मां सरस्वती हम सभी की चेतना को ज्ञानोन्मुख करें।

प्रकृति अद्वैत और मानव

अब तक हुए सबसे बेहतरीन मनोविचारकों में से एक एरिक फ्रॉम ने कहा है कि मनुष्य की मूलभूत कठिनाई ये है कि, है तो वो प्रकृति का एक अंग पर जीवन प्रयन्त कोशिश करता है प्रकृति से अलग हो जाने के लिए ! यही दिक्कत है मनुष्य के साथ । वह है तो मौलिकतः पशु ही लेकिन जीवनपर्यंत यह सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है कि वह कुछ अलग है ! भिन्न है । यह भिन्न होना वैसा ही है जैसा हिरन भिन्न है चीते से । शार्क भिन्न है बाज से । कबूतर भिन्न है कुत्ता से । ऐसे ही मनुष्य भिन्न है अन्य पशुओं से । पशुओं में एक पशु है मनुष्य । तथाकथित धर्मों ने इसमें बड़ा रोल अदा किया कि मनुष्य अपने को प्रकृति से ऊपर समझे। प्रकृति से अलग होने की जो भावना है यह पहले मनुष्य में धर्म के द्वारा पैदा हुआ और फिर विज्ञान के द्वारा । धर्म और विज्ञान दोनों ने मिलकर मनुष्य के मन को प्रकृति से तोड़ दिया । ऐसा कि मनुष्य के मन और प्रकृति में एक द्वैत पैदा हो गया है। 99 फीसदी से भी अधिक तकलीफ इसी द्वैत की वजह से है। जो कोई भी इस द्वैत को लांघ प्रकृति और स्वयं के बीच अद्वैत को महसूस कर लेता है; उसका जीवन अत्यंत सरल और सुखद हो जाता है। मिट्...

यथार्थ 🌱

जिंदगी में कंसेप्ट क्लियर रखिए। यहां कोई किसी के लिए अनन्य रूप से नही है। इंसान अकेला आता है और अकेला निकल लेता है । संग साथ बनते हैं। संग साथ का एक मात्र आधार सुख है । यदि कोई आपके साथ सुखी महसूस करता है तो वह आपका साथ चाहेगा । सुख नही तो वह किनारे हो जाएगा । सुख सेक्स का हो सकता है, सुख भोजन का हो सकता है, सुख सेवा का हो सकता है, सुख सिर्फ बात करने का हो सकता है, सुख महज साथ बैठे होने का हो सकता है। सुख होगा तभी कोई साथ होगा । अन्यथा हो कर भी सम्भव है कि साथ नही हो । कल किसी को आपके साथ सुख मिलता था । कल आपके साथ था । आज नही मिल रहा है तो नही होगा । आप कह सकते हैं कि यह बात सत्य नही है। क्योंकि फेमिली में लोग दुख में भी साथ होते हैं। वो दुख में भी साथ होते हैं क्योंकि वहां दायित्व निभाने का सुख है। ईगो की तुष्टि है। कि दुख में भी मैं साथ हूँ; यह कहने का भी सुख है । फंडामेंटली यहां कोई किसी के लिए नही है। हर कोई अकेले आता है और अकेले चला जाता है। साथ कोई है तो इसलिए कि साथ सुख दे रहा है। आनन्द दे रहा है। सुख खत्म साथ खत्म !

पढ़िए ये आपको काम आएगी।

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1. कहीं से कोई चमत्कार नहीं होने वाला। वो केवल आप हैं जो चमत्कार कर सकते हैं , कर सकती हैं । अपनी हौसलों, मेहनत और निरन्तरता के बल पर आप सब कुछ पा लेंगे जो आपने सोचा था। और यही आपका चमत्कार होगा। 2. बाहर से कोई भी आपकी मदद नहीं कर सकता। आप परेशान हैं, टूट चुके हैं, बिस्तर और कम्फर्ट हावी हो गया है, टालमटोल, सुस्ती, लक्ष्य से भटकाव इत्यादि के चक्र में फँस चुके हैं। तो केवल आप ही स्वयं की मदद कर सकते हैं। बाहर से कोई मदद करना भी चाहे तो कारगर नहीं होगा। 3. मौन ही आपका पथप्रदर्शक है। जब भी आप कहीं फँस गए हों। जीवन के किसी बिंदु पर समझ नहीं आ रहा क्या करा जाए। जीवन कई पहलुओं पर उलझ गया हो, मन पर नियंत्रण न रह रहा हो, कुछ भी आप समझ न पा रहे हों तो एक एकांत चुने और मौन हो जाएं। इस मन का स्त्रोत मौन ही है। करके देखे सब स्पष्ट हो जाएगा। 4. स्वयं के प्रति उत्तरदायित्व। आप ऐसे समझें कि आप हील स्टेशन पर एक वाहन चला रहे हैं जिनमे आपका परिवार भी सफ़र कर रहा है। आप यहाँ पर गलती नहीं कर सकते। आपकी एकाग्रता यहाँ पर चरम बिंदु पर होगी। आपको पता होगा कि मेरी एक गलती मेरा परिवार का जान ले ल...

प्यार क्या है ?

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मनुष्यता के इतिहास में जिन प्रश्नों पर सबसे अधिक चिंतन हुआ है उसमें से एक ये है प्यार क्या है। तमाम प्रश्नो कि तरह इसका भी एक सही जवाब आजतक नहीं मिल पाया। जिस तरह दो लोगों के फिंगर प्रिंट एक तरह नहीं हो सकते उसी तरह दो लोगों की प्रेम कि समझ और उसकी परिभाषा एक जैसी नहीं हो सकती। इस संसार में जितने लोग हैं प्रेम को पाने और प्रेम और प्रेम को समझने के उतने तरीके हो सकते हैं। इसके बावजूद प्रेम की कोई एक मान्य परिभाषा नहीं हो सकती। जिस चिज को मैं प्रेम मानूंगा कोई दुसरा व्यक्ति उसे वासना कहने लगेगा कोई तीसरा व्यक्ति उसे लालच कहने लगेगा। प्रेम की सबकी परिभाषाएं अलग अलग हो जाती हैं। जब कोई ये कहता है कि प्यार वो अनुभूति है जो हमें अकेला होने से बचाती है या मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देती है या जिंदगी की झुलसा देने वाली आग के बीच मेरी आत्मा पर पानी की शीतल बूंदें बरसाती है तब भी हम प्यार कि परिभाषा नहीं कर पाते हम प्यार कि उपयोग के बारे में चर्चा कर रहे होते हैं। और तब मात्र प्यार हीं नहीं प्यार से जुड़ी तमाम कलाओं की परिभाषा लगभग असम्भव है। हम क्या करते हैं हम उपयोग को परिभाषा समझने ...